Friday, April 26, 2013

नैतिक मूल्यों का सांस्कृतिक प्रदूषण

संक्रमण के दौर से गुजर रहा हमारा समाज आधुनिकता एवं पारंपरिकता के द्वंद में फंसा सा दीख रहा है, एक तरफ हमारी सांस्कृतिक विरासत है तो दूसरी ओर वैचारिक स्वतंत्रता एवं समाज के खुलेपन की होड़ में नैतिकता हाशिए पर है। रिश्तों की गरिमा तार तार हो रही है, समाज में दरिंदगी ऐसी फैल रही है कि मासूम बच्चे भी समाज के इस वहशीपन से अछुते नही है।
सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ होने का दंभ और ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमने तत्र देवता’ का दर्शन प्रस्तुत करने वाला भारत आज नैतिकता में बड़ा कमजोर सा प्रतीत हो रहा है। कड़े कानून की मांग और प्रशासनिक दोषारोपण से ऐसी समस्याओं का समाधान हो ऐसा संभव नही है। नैतिक मूल्यों के पतन के लिए सरकार या प्रशासन प्रत्यक्ष् ा रूप से जिम्मेवार नही हो सकता, अगर 2-4 दुष्कर्मियों को फांसी के तख्ते पर लटका भी दिया जाए तो क्या ऐसी घटनाओं पर अंकुश लग जाएगा? हमारे पास कानून की एक लंबी श्रृंखला है, सैकड़ो दोषी सज़ा पाते है फिर भी ऐसी घटनाएं दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है।
बड़े शहरों से चलकर अब अर्द्धशहरी और ग्रामीण कस्बाई इलाके भी सांस्कृतिक प्रदूषण की चपेट में है। परिवार और समाज में एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना बढ़ रही है। चाचा, मामा, भैया, दीदी, भाभी जैसे रिश्ते अब विलुप्त होते जा रहे है, ऐसे रिश्तों की प्रासंगिकता बतलाने वाले दादा दादी, नाना नानी भी वीडियो गेम्स और फेसबुक से रिप्लेस होते जा रहे है। यौनोन्माद के लिए एक पागलपन की मनोवृति का प्रसार हो रहा है, जो नैतिक मूल्यों को भी धराशायी कर रहा है। क्या इस पागलपन को सिर्फ कानून के बना देने से रोका जा सकता है?
दरअसल समाज में फैल रहे ऐसे मनोवृति के लिए हमारे सास्कृतिक मूल्यों से हमारी दूरियां एवं परिवार जैसी उन्नत संस्थाओं का टूटना है, मनुष्य के अन्तर्मन की शुद्धता कभी भी कानून के डंडे से ठीक नही किया जा सकता, किसी व्यक्ति के नैतिकता का ह्रास उसके  सामाजीकरण की विफलता का परिणाम है न कि प्रशासनिक विफलता का। लेकिन हां ऐसे घटनाओं के लिए ऐसी कठोर सज़ा भी अवश्य मिलनी चाहिए ताकि इसकी पुनरावृति न हो। भारत जैसे पारंपरिक देश में आधुनिकता एक नयी सोच है, आधुनिकता और उन्मुक्तता के द्वंद में हम अपने पारंपरिक मूल्यों को खोते जा रहे है। हमारे पारंपरिक आदर्श केवल सैद्धांतिक पाठ के रूप में रह गए है, जो केवल दिन विशेष को ही याद किए जाते है।
हम समाज में सेक्स शिक्षा की अनिवार्यता पर जोर देते है, लेकिन नैतिक शिक्षा को वैकल्पिक विषय के रूप तक ही सीमित रखते है। क्या इस असंतुलन से हम एक संतुलित समाज की कल्पना कर सकते है? विविध उपायों से सुरक्षित यौन सबंधों को की वकालत करने की शिक्षा और परस्त्री के साथ यौन संबंधों को अनैतिक ठहराने वाले नैतिकता के पाठ में समाज के लिए क्या उचित है इसका निर्धारण तो हमें ही करना होगा। समाज में नैतिक मूल्यों के निर्धारण में परिवार जैसी सामाजिक संस्थाओं को सुदृढ करना होगा।


   

Thursday, April 4, 2013

आतंकवाद की रंगीन परिभाषा और लाशों का मूल्य निर्धारण

हैदराबाद में हुए बम धमाकों ने एक बार फिर से आतंकियों के मनोबल को बढ़ा दिया है। धमाकों की गूंज एक आम आदमी के दर्द से होते हुए फिर एक दफे राजनीतिक गलियारों में हुक्ममरानों के लिए 'लाषों के मूल्य निर्धारण की रस्म अदायगी बन कर रह गयी।
वर्षों तक आतंकियों के मेहमाननवाजी के बाद भी सरकार आतंकवाद की 'रंग-बिरंगी परिभाषा तक के ही निष्कर्ष पर पहुंच सकी, देष के दुष्मन को परिभाषित करने की लंबी प्रकि्रया के बीच कीड़े मकौड़े की भांति दम तोड़ता आम आदमी और हर बार की तरह बिना किसी निष्कर्ष के होने वाले 'जांच के बीच सरकार की डिमेंषिया (भूलने की बिमारी) देष के दुष्मनों के मनोबल को बढ़ाने के लिए काफी है। आतंकवाद से लड़ने का 'सैद्धांतिक संकल्प और ऐसी घटनाओं के बाद मुवावजे की रस्म अदायगी से हमारी पहचान एक  ऐसे 'साफट नेषन के रूप में होती जा रही है जो इतना सहनषील है जो कभी पलट के वार नही करता।
धमाकों की लंबी श्रृंखला के बाद हर बार टीवी स्टूडियों में पुरानी गलतियों की समीक्षा और लंबी बहस के अलावे कुछ भी नही होता, मंत्री जी राज्य सरकार को  दोषी ठहराते है तो राज्य केंद्र को, इस रस्साकषी में बजट में हर साल सुरक्षा के नाम पर फंड बढ़ता जाता है फिर भी हम चौक चौराहों में एक सीसीटीवी कैमरे तक को भी दुरूस्त नही कर पाते। देष में हार्इ अलर्ट की घोषणा घटना घट जाने के बाद होती है, लेकिन खुफिया विभाग की चेतावनी फाइलों में ही दब कर रह जाती है।
सरकार किसी की हो कुर्सी पर बैठे 'खास और फुटपाथ और लोकल ट्रेन में धक्के खाती 'आम जनता के बीच एक बहुत बड़ी खार्इ है, जिसमें बम ब्लास्ट और ट्रेन एक्सीडेंट से मरने वालों की कीमत चंद रूपयों की है। सरकार कीमत अदा करती है और भविष्य में ऐसे हादसों के लिए फिर से फंड का इंतजाम कर लेती है। सवा सौ करोड़ की जनता के देष में 10-20 लोगों की जान की कीमत भला हो भी क्या  सकती है?
देष में लोगों के कीमत निर्धारण के पहले महत्व का निर्धारण करना होगा, एक आम और खास दोनों देष में समान महत्व के है और उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है। सुरक्षा के हवार्इ किले बनाने से अच्छा होगा कि हम अपनी आधारभूत संरचना को ठीक करें। और आतंकवाद की रंग-बिरंगी परिभाषा गढ़ने के बजाय सीधे षब्दों में यह सुनिषिचत करे कि देष के प्रति बुरा सोचना ही आतंकवाद है, चाहे ऐसा सोचनेवाला किसी भी रंग या किसी भी मजहब का हो।
-----------------------------------------------------

अन्तर्राष्ट्रीय सूचना प्रवाह के बदलते आयाम


विष्व में सभ्यता के आदि चरण से ही संसाधनों पर प्रभुत्व स्थापित करने की होड़ रही है। इतिहास के पन्नों में कभी हथियार तो कभी व्यापार वो माध्यम बने जो किसी भी देष को ‘संपन्न’ व ‘विपन्न’ से संबोधित करते रहे है।
    पर बदलते वैष्विक परिदृष्य ने संपन्नता और विपन्नता के पैमाने बदल दिए है, आज सूचना की षक्ति हथियारों से कहीं ज़्यादा घातक व असरदार है, वहीं सूचना की विपन्नता किसी भी देष के लिए सबसे बड़ी कमज़ोरी है। पर प्रष्न है कि क्या अन्तर्राष्ट्रीय धरातल में सूचना की प्रकृति हमेषा एक सी रहती है? क्या हमारे लिए उपयोगी सूचनाएं अन्य देषों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी? सामान्य तौर पर ऐसा नही होता है क्योंकि सूचनाओं की महत्ता राष्ट्र दर राष्ट्र बदलती रही है, उदाहरणस्वरूप देखें तो अभी हाल में भारत के केरल में दो मछुआरों की हत्या के आरोपी दो इटली के नौसैनिकों को भारतीय सरकार ने दोषी घोषित किया पर वही आरोपियों को इटली की मीडिया ने हीरो की तरह पेष किया।
उन्हे एक सच्चे इटालियन सैनिक और देषभक्त का दर्जा दिया गया, जबकि सीधे तौर पर वे भारत सरकार के दोषी है।
    वर्तमान कमप्यूटर और इंटरनेट के युग में सूचनाओं की गति प्रकाष की गति से भी तीव्र हो गयी है, आज पलक झपकते हमारे पास समस्त सूचनाएं उपलब्ध है, पर क्या ये सभी सूचनाएं सत्य पर आधारित है या किसी खास उद्येष्य से बनाए गए है? वैष्वीकरण के इस युग में इंटरनेट के बिना दुनिया की कल्पना नही की जा सकती और आंकड़ें बताते है कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं में 64 प्रतिषत अमेरिका एवं 24 प्रतिषत इंग्लैंड की कंपनियों का बोलबाला है, अतः स्पष्ट है कि सूचना के निर्माण व प्रसार में भी इन्ही का प्रभुत्व है।
    विकसित व विकासषील देषों के बीच आज यही षक्ति एक विभाजनकारी रेखा बन रही है, और विकसित राष्ट्रों के द्वारा प्रसारित की गई सूचना अन्य देषों के पास उसी स्वरूप में पहुंच जाए इसकी कोई गारंटी नही है। जैसे ‘डिस्कवरी’ व ‘नेषनल ज्योग्रफिक’ जैसे विज्ञान आधारित चैनलों का प्रसारण इन्हीं देषों के द्वारा किया जाता है और निष्चयतः इन देषों की कंपनियां ही इन चैनलों के लिए सबसे बड़े विज्ञापन दाता है, इस दिषा में इनके हितों का संवर्द्धन करना इन चैनलों का लक्ष्य होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा कार्यक्रमों की रूपरेखा भी प्रभावित होती है, कहीं न कहीं दर्षकों के मन में विकसित राष्ट्र के प्रति सम्मान व अन्य पिछड़े देषों के प्रति घृणा की भावना का जन्म होता है। अभी हाल के वर्षों तक भारत की छवि अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर सपेरों व जादू-टोना करने वाले लोगों की थी। वहीं अमेरिका व अन्य पष्चिमी देषों की छवि हमेषा एक सभ्य व उच्च मानसिकता वालों के रूप में दर्षाया जाता रहा है, जबकि पष्चिम के विकसित देषों में भारतीय इंजीनियर, डाॅक्टर व अन्य पेषेवर लोग इनके अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार है, जिसकी कही भी चर्चा नही होती। वैष्विक बाजार में अमेरिका एवं पष्चिमी देषों की सर्वोच्चता इसी सूचना के प्रसार से संभव है कि पष्चिमी देषों की कार्यसंस्कृति अन्य देषों की तुलना में कही बेहतर है।
    भूमंडलीकरण के इस युग में आतंकवाद एक वैष्विक समस्या है, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर सभी देषों की राय अलग अलग है, न्यूयार्क में 9-11 की घटना की तस्वीरें अमेरिकी मीडिया के द्वारा काफी संषोधित रूप में सामने आया, क्योंकि ये घटना न केवल अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे रही थी, बल्कि इसके प्रभुत्व के भविष्य पर भी प्रष्न चिन्ह लगा रही थे। इस स्थिति में यह आवष्यक था कि विष्व में ये संदेष कतई ना जाए कि अमेरिका भी अन्य देषों की तरह आतंकवाद के सामने घुटने टेक रहा है। आतंकवाद से लड़ने की प्रतिबद्धता को दर्षाने के लिए अमेरिका ने इराक, सीरिया और अफगानिस्तान जैसे देषों के आंतरिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर रहा है ताकि ये संदेष प्रसारित हो कि अमेरिका ही एकमात्र मानवाधिकार का रक्षक है।
    वर्तमान परिदृष्य में सूचनाओं का प्रवाह विकसित देषों से विकासषील देषों की ओर हो रहा है, सूचनाएं की प्रवृति भी वैसी है कि हर स्थिति में विकसित देषों का ही हित सधे, सूचनाओं का प्रवाह एकपक्षीय हो रहा है, जहां विकासषील देष केवल सूचना संग्राहक की भूमिका में है। वो केवल सूचनाओं को ग्रहण कर सकते है, उसकी विष्वसनीयता पर कोई प्रष्न चिंह नही लगा सकते क्योंकि वैष्विक परिदृष्य में उनकी बातों का कोई अस्तित्व नही है। उदाहणस्वरूप हम देखे तो तिब्बत के लोग कई वर्षों से अलग देष व चीन के प्रभुत्व से छुटकारे की मांग कर रहे है, लेकिन उनकी आवाज़ या तो चीन के तानाषाही सरकार के आगे खो जाती है या फिर वैष्विक समर्थन के अभाव में दम तोड़ देती है। तिब्बत के लोगों का न तो पष्चिमी विकसित देषों का समर्थन प्राप्त है और ना ही वे स्वयं में कोई बड़ी ताकत के रूप में है।
    सोषल मीडिया के इस दौर में गूगल और इन्साइक्लोपीडिया की परिभाषाओं को ही सत्य और विष्वसनीय माना जा रहा है, सूचनाओं के दृष्टिकोण में न केवल वे समृद्ध है, बल्कि तकनीकी के मामलों में भी वे सबसे आगे है इस संदर्भ में लोगों की जिज्ञासा ऐसी ही कंपनियों पर आश्रित होती जा रही है। अब वे जो भी सूचनाएं प्रदान करे लोग उसे ही सत्य मानने लगते है। अगर हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि भारत की धार्मिक मान्यताएं व ऐतिहासिक षब्दावली यहां के लोगों की मान्यताओं से कही अलग है, परंतु भारत से दूर बैठा कोई व्यक्ति अगर यहां के ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व को समझना चाहता है तो वो वही समझेगा जो उसे इंटरनेट में गूगल व एन्साइक्लोपीडिया उपलब्ध कराएगी। अभी कुछ दिनों पूर्व बाबा रामदेव एवं ‘सेंटर फोर इन्वायरोमेंट एंड साइंस’ की निदेषक सुनीता नारायण ने अपने षोध से कोका कोला जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद को स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से प्रतिकूल बताया, जिससे कि कंपनी का व्यापार भारत में काफी प्रभावित हुआ, लेकिन कंपनी ने अपने पक्ष को मजबूती से प्रस्तुत करते हुए अपने उत्पादों को विष्व बाजार में क्लीन चिट दिलवा दी और ऐसे संस्थानों के षोध को ही कठघरे में ला खड़ा कर दिया। कहने का अर्थ यही है कि सूचना की सत्यता से कही महत्वपूर्ण सूचना के प्रस्तुतीकरण पर निर्भर करता है भले ही सूचना में तनिक भी सच्चाई न हो लेकिन वो ही सर्वग्राह्य समझे जाएंगे। भारत की जनता बाॅलीवुड के फिल्मों के नायकों एवं क्रिकेट खिलाडि़यों को एक भगवान की तरह मानते है, तो उनके द्वारा कही गई बातों (भले ही वो किसी उत्पाद का विज्ञापन ही क्यों न हो ) के प्रति आस्था किसी भी अन्य माध्यमों की तुलना में कही अधिक होती है, कोका कोला कंपनी ने भी अपनी बातों को ऐसे ही सेलेब्रेटी के सहारे लोगों के समक्ष रखा जो कि सफल भी रहा। 
कहने का तात्पर्य यह है कि पष्चिमी देषों की नीतियां व उत्पाद हमेषा ऐसे वातावरण का निर्माण करते है ताकि इनका हमेषा पोषण होते रहे, इसके लिए चाहे उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकाना पड़े। अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर जहां एक ओर सोषल मीडिया को लोगों की आवाज़ बतायी जाती है और सूचना को एक मानवीय अधिकार बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे माध्यमों को कई बहानों से रोका भी जा रहा है सूचना की स्वीकार्यता पष्चिमी देषों के मुहर पर आश्रित होती जा रही है।
-------------------------------------------------------------
                           

Wednesday, March 20, 2013

भारतीय व पश्चिमी संस्कृति में अंतर एवं समानताएं


भारत सैद्धांतिक और वास्तविक रूप में एक बहुल समाज है। भारत के लोगों को इसकी एकता और विभिन्नता द्वारा समझना उचित होगा। विदेशी आक्रमणों, मुगल और ब्रिटिश शासन के उपरान्त भी भारत में संस्कृतियों, धर्मों, भाषाओं का सम्मिश्रण और विभिन्न जातियों के बीच एकता और समरूपता बनी रही। यद्यपि तीक्ष्ण आर्थिक और सामाजिक असमानताओं ने सम सामाजिक संबंधों के प्रादुर्भाव में बाधा उत्पन्न की, फिर भी राष्ट्रीय एकता और अखंडता अक्षुण बनी रही। इसी सम्मिश्रणता के द्वारा भारत एक अद्वितीय मिश्रित समाज बना हुआ है। वास्तव में भारत एक अनुठा दृश्यपटल है जिसका समानान्तर स्वरूप अन्य महाद्वीपों में दृष्टिगत नही होता, विदेशी आक्रमण संसार के अन्य भागों से आप्रवासन, विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों के अस्तित्व के कारण भारतीय संस्कृति न केवल सहिष्णु ही है, बल्कि अपनी विशिष्टता और ऐतिहासिकता को संजोए हुए एक अनूठी निरन्तर और जीवंत संस्कृति भी है।
    भारतीय सांस्कृतिक परम्परा अद्वितीय है, धर्म, कर्म और जाति व्यवस्था के सोपानीय रूप में भारतीय संस्कृति की मुख्य धारणाएं है। इन तत्वों के संरूपण और मतैक्य के कारण भारतीय समाज में संतुलन और स्थायित्व सुदृढ़ हुए। भारतीय समाज की विशिष्टता केवल इसकी गूढ़ प्रवृति से ही नही है, इसका सही अर्थ समझने के लिए इसकी ऐतिहासिकता और संदर्भता का सूक्ष्म विश्लेषण करना पड़ेगा। यहां सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रवृŸिायां आत्मसात और सात्मीकरण की प्रक्रियाओं द्वारा दिखाई पड़ती है।
    आर्य और द्रविड़ एक साथ रहे, हिन्दू और मुसलमान सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को साझा करते रहे है। समयोपरांत ईसाई भी हिन्दुओं और मुसलमानों के साथ रहे। आज हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई और जैन के साथ कई मान्यताओं को मानने वाले एक सामान्य विरासत के संवाहक है। भौगोलिक विविधताओं के कारण संस्कृति व परंपराओं में थोड़ी बहुत अंतर देखने को मिलता है, लेकिन भारतीयों की प्रकृति के साथ समन्वय बना कर चलने की परंपरा सभी में सामान्य रूप से विद्यमान है।
    वेदों और उपनिषदों के तत्व ज्ञान ने जहां लोगों को जीवन के मर्म को समझाया वहीं आयुर्वेद एवं सांख्यिकी के ज्ञान ने आधुनिकता की नींव रखी। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के दर्शन को लोगों ने जीवन का आधार बनाया एवं न्यूनतम भौतिक आवश्यकताओं में सुखी जीवनयापन के मार्ग को समाहित किया। प्राकृतिक तरीकों से प्रकृति के साथ संतुलन और अंततः ज्ञान की तलाश में सन्यास धारण करना संपूर्ण विश्व को भारतीयों ने ही सिखाया।  नगरीकरण के द्वितीय चरण (ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी) में भौतिकवादी संस्कृति व संसाधनों के प्रभुत्व की होड़ में जब एक उहापोह की स्थिति बनी हुई थी, तब गौतम बुद्ध के अहिंसा के मार्ग ने लोगों को एक नयी दिशा प्रदान की, जो आज विश्व के बहुसंख्य को एक उद्येश्यपरक जीने की राह दिखला रहा है।
    एक जीवंत सभ्यता के कई चरणों के फलस्वरूप आज भी भारतीय अपनी परंपराओं व संस्कृति को संजोए हुए है, आधुनिकता के चकाचैंध व भौतिकवादी संस्कृति के मध्य भी भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप सुरक्षित है। परंपराएं जहां संस्थागत रूप ले चुकी है और संस्कृति को रूढि़वादी संज्ञा से दर्शाया जाता है, उसी समाज में ऐसे पारंपरिक शब्दावलियों अपने वैज्ञानिक आधार के सहारे समाज में अपनी जीवंतता बनाए हुए है।
    आधुनिक विश्व में परंपरावादी और गैर परंपरावादी राष्ट्र का विभाजन स्पष्ट तौर से दीख पड़ता है, विकसित और विकासशील राष्ट्रों का ध्रुवीकरण पूर्वी व पश्चिमी देशों के भौगोलिक संरचना पर आधारित है। भारत की परंपरावादी संस्कृति व पश्चिम की आधुनिकतावादी सोच के मूल ही में अंतर है, भारतीय दर्शन जहां गैर भौतिकवाद का समर्थक है वहीं पश्चिमी दर्शन पूर्णतः भौतिकवाद के आधार पर खड़ा है। भारतीय दर्शन संपूर्ण विश्व को एक परिवार की तरह और इसके सदस्यों को अपने बंधु-बांधव के समान समझता है, वहीं पश्चिमी संस्कृति पूरे विश्व को एक बाज़ार और यहां रहने वालों को खरीदार की नज़रों से देखता है, इस बाज़ार में उसी का अस्तित्व संभव है, जो खरीदने की क्षमता रखता है, जो भौतिक वस्तुओं को खरीदने में अक्षम है वो पश्चिम के दर्शन में फिट नही बैठता।
    आधुनिक विज्ञान के सहारे पश्चिम ने प्रकृति के नियमों को चुनौती दी है, अपनी जिजीविषा को अपने शोधों व अध्ययन से शांत किया है, आकाश में टिमटिमाने वाले चाँद, तारों की भी दूरियां नाप ली है। जीवन को आलीशान बनाने के लिए अनगिनत अविष्कारों से वैश्विक ढ़ांचे को ही बदल कर रख दिया है। तीव्रतम गति से लेकर सूक्ष्मतम विश्लेषण बगैर पश्चिमी विज्ञान के कल्पना नही की जा सकती है। संस्कृति का यह नवरूप सबसे आकर्षक है जिसके आकर्षण से लगभग सम्पूर्ण विश्व प्रभावित है, समाजशास्त्रीय परिभाषा के अर्थों में देखे तो ‘परसंस्कृतिग्रहण’ की यह परंपरा अन्य संस्कृतियों को तेजी से विस्थापित कर रही है।
    फास्टफूड और उन्मादपूर्ण जीवन के “कंपोजिट कल्चर” ने भारतीय संस्कृति को भी प्रभावित किया है, भौतिकवाद के आकर्षण में प्रकृति के साथ संतुलन असंतुलित होती जा रही है। विलासी जीवन के अंतहीन होड़ ने मनुष्य के जीवन को यौनोन्माद और भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति तक ही संकुचित कर दिया है। वर्तमान में जीने की संस्कृति में हम अपने आने वाले कल की चिंता नही कर रहे है। अधिकाधिक पैसे की चाहत और पैसे से दुनिया की हर भौतिक सुख सुविधा खरीदने की जि़द हमें न केवल एक मिथ्या भ्रम में धकेल रहा है, बल्कि एक विनाशकारी भविष्या को भी आमंत्रण दे रहा है।
    चूँकि संस्कृति का मूल तत्व ही है कि वह परंपरा में शामिल हो जाए और सर्वग्राह्य हो जाए, और आज के भौतिकवादी संस्कृति में पश्चिम का यह दर्शन तेजी से फैल रहा है। लोगों की मनोवृति विलासी जीवन के प्रति तेजी से आकर्षित होती है अतः स्वाभाविक है कि सादे जीवन की तुलना में आलीशान जीवन का आकर्षण भी तेजी से फैलेगा।
    भारतीय सांस्कृतिक विरासत के पीछे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पश्चिम के देशों के सांस्कृतिक मूल्यों के पीछे स्पष्ट विभाजन है कि एक परलौकिक सुख और मोक्ष को अंततः जीवन का उद्येश्य मानता है तो दूसरा धरती में ही सुखी रहने के हरसंभव भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति को एकमेव लक्ष्य मानता है। पश्चिम जहां संसार के गतिमान होने के पीछे के कारणों को परलौकिक न मानकर एक वैज्ञानिकीय घटना बताता है तो वहीं भारतीय मान्यताएं इसके पीछे किसी सर्वशक्तिमान की शक्ति को महत्व देता है। भौगोलिक संरचना भी एक दूसरे के सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते है, भारत जैसे प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण देश और समशीतोष्ण जलवायु में जीने के लिए पश्चिमी देशों की तुलना में संघर्ष कम है, जबकि शुष्क वातावरण में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत व्यक्ति में प्रकृति से लड़ने की प्रवृति का विकास कही तेजी से होता है, और उनकी यही प्रवृति उनके परंपराओं में समाहित होकर अंततः उनके संस्कृति का हिस्सा बनते चले गए।
    भूमंडलीकरण के दौर में जहां भौगोलिक दूरियां मिटती जा रही है, वहीं व्यापार व संचार माध्यमों के विकास से एक दूसरे की संस्कृति को तेजी से अपना भी रहे है, पश्चिम के जींस-पैंट के पहनावे को जिस तेजी से भारतीयों ने स्वीकार किया है शायद ही किसी आन्य देश की जनता ने किया हो। भागदौड़ के जीवन में पश्चिमी पहनावे भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। भारतीय पारंपरिक खान-पान व शाकाहारी भोजन की महत्ता को अब पश्चिमी विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सबसे उपयुक्त भी बता रहा है, भारतीय भोजन आज पश्चिम में सबसे प्रसिद्ध भोजनों में गिनी जा रही है। अब यह तय कर पाना मुश्किल है कि योग कहाँ की संस्कृति का हिस्सा है, योग की बढ़ती महत्ता ने इस भारतीय संस्कृति को एक साझी संस्कृति में बदल कर रख दिया है। भौतिकवाद के चरम बिंदु पर पहूँच कर अब पश्चिमी चिंतक भी आध्यात्म के माध्यम से मन की शांति तलाश रहे है। वहीं भारतीय युवा पश्चिम के भोगवादी संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे है, खुले समाज की सोच और स्वकेंद्रीत जीवन की कल्पना पश्चिम के सांस्कृतिक मूल्यों से उधार स्वरूप लिए गए है।
     समाज के आपसी संसर्ग से संस्कृतियों का हमेशा आदान प्रदान होता रहा है, अन्र्तग्रहण की यह प्रक्रिया समाज की जीवंतता का मुख्य लक्षण है, भौगोलिक दूरियां जितनी तेजी से कम होगी यह प्रक्रिया उतने ही तेजी से होगी। विश्व के संपूर्ण भागों के लिए किसी एक सामन्य संस्कृति की कल्पना तो निश्चयतः अव्यवहारिक है, लेकिन आधुनिक विज्ञान के तीव्र विकास ने विविध संस्कृतियों के मध्य के अंतर को काफी हद तक सामान्य बना दिया है, यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नही होगी।
         ------------------------------------------

Friday, March 8, 2013

दिल से निकलेगी न मर कर वतन की उल्फ़त..

दिल से निकलेगी न मर कर वतन की उल्फ़त...
मेरी मिट्टी से भी खुषबु-ए-वतन आएगी.........
फांसी के तख्तें पर खड़े होकर मुस्कुराते हुए यह गाते नौजवानों ने अपने जीने के उद्येष्य को परिभाषित कर दिया, अंग्रेजी सरकार इन क्रांतिकारियों के जीने के अधिकार को भले ही छीन लिया हो लेकिन उनके राजनीतिक दर्षन और विचारों को देष के कोने कोने तक फैलने से नही रोक सकी।
महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन से प्ररित होकर असहयोग आंदोलन में अपनी पढ़ाई-लिखाई और अपने घर-बार तक छोड़ कर आने वाले युवाओं ने कभी ये नही सोचा था कि उनके आदर्ष के द्वारा आंदोलन वापस ले लिया जाएगा, इस घटनाक्रम ने इन उत्साही युवकों का अहिंसक आंदोलन के प्रति निष्ठा को तोड़ दिया, अहिंसक आन्दोलनों से ऐसे युवाओं का विष्वास उठने लगा और किसी विकल्प की की तलाष होने लगी।
उहापोह की इस स्थिति में षचीन्द्रनााथ सान्याल की ‘बंदी जीवन’ इन युवाओं के लिए एक पाठ्य पुस्तक के रूप में सामने आयी और अपने ओजपूर्ण आह्वान से सैकड़ो ऐसे युवाओं को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। कांतिकारी दर्षन से प्रभावित युवाओं ने कानपुर के एक सम्मेलन में हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएषन( एच आर ए ) की स्थापना की और अंग्रेजों के विरूद्ध एक घोषित यु़द्ध छेड़ दिया। का्रंतिकारी आन्दोलन के प्रांरंभिक चरण के प्रमुख सैनिकों में भगत सिंह, अषफाकउलाह, रामप्रसाद बिस्मिल एवं राजेन्द्र लाहिड़ी जैसे युवा षामिल थे, जिनका एकमेव उद्येष्य का्रंतिकारी आन्दोलनों की निरंतरता के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करना था। का्रंतिकारी युवा व्यक्तिगत आतंकवाद और हत्या की राजनीति के बदले संगठित का्रंतिकारी कार्रवाई में विष्वास करते थे, लेकिन 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीषन के खिलाफ प्रदर्षन के दौरान लाला लाजपत राय पर बर्बर लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मौत ने युवा क्रांतिकारियों को एक बार फिर व्यक्तिगत आतंकवाद और हत्या की राह पकड़ने पर मजबूर कर दिया। युवा क्रांतिकारियों ने ‘षेर-ए-पंजाब’ के नाम से मषहूर इस महान नेता की हत्या को अपने पौरूष के लिए चुनौती समझा और उसे स्वीकार किया। 17 सितम्बर 1928 को भगत सिंह, चन्द्रषेखर आज़ाद और राजगुरू ने लाहौर में लालाा जी पर लाठी बरसाने वाले एक पुलिस अधिकारी साॅन्डर्स की हत्या कर दी। हत्या के बाद एच एस आर ए की तरफ से पोस्टर लगाए गए जिसमें लिखा था: ‘ लाखों लोगों के चहेते नेता की एक सिपाही द्वारा हत्या पूरे देष का अपमान था। इसका बदला लेना भारतीय युवकों का कर्तव्य था, साॅन्डर्स की हत्या पर हमें दुख है पर वह उस अमानवीय और अन्यायी व्यवस्था का एक अंग था, जिसे नष्ट करने के लिए हम संघर्ष कर रहे है।’
अपनी क्रांतिकारी रणनीतियों में भगत सिंह और उनके साथियों ने जनता को यह समझाने का निणर्य किया कि वे उनके अन्य लड़ाईयों में भी साथ है, और उनकी लड़ाई व्यक्तिगत न होकर सामूहिक रूप में लड़ी जाए, सरकार इस समय जनता विषेषकर मज़दूरों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के मकसद से दो विधेयक ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ लाने की तैयारी में थी, इसके प्रति विरोध जताने के लिए भगत सिंह और बटुकेष्वर दत्त को सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में बम फेंकने का काम सौंपा गया। बम फेंकने का उद्येष्य किसी को नुकसान पहुंचाना नही बल्कि सत्ता के बहरे कानों में विरोध की आवाज पहुंचाना था। सदन में पर्चे फेंके गए जिसमें लिखा था ‘ बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए ’
भगत सिंह और बी के दत्त पर मुकदमा चला, बाद में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू एवं अन्य क्रांतिकारियों पर अनेक षडयंत्रों में षामिल होने का मुकदमा चला। युवा क्रांतिकारी अदालत में जो बयान देते वो अगले दिन अखबारों में छपते जिससे पूरे देष में उनका प्रचार होता। अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध, निडर एवं दुस्साहसी ये युवा क्रांतिकारी रोज अदालत में ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का नारा लगाते हुए प्रवेष करते, कटघरें में बेडि़यों में जकड़े ‘ मेरा रंग दे बसन्ती चोला और सरफरोषी की तमन्ना अब हमारे दिल में है जैसे गीतों ने पूरे देष को झकझोर दिया, अहिंसक आन्दोलनों में विष्वास रखने वाले भी अब इन क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति रखने लगे, भगत सिंह का नाम हर जुबान पे था, जेल की अमानवीय दषा में सुधार के लिए इन युवाओं का अनषन एवं 72 दिनों तक की भूख हड़ताल ने अंगे्रजी सरकार को हिला कर रख दिया, वहीं पूरे देष से इनके लिए समर्थन के स्वर उठने लगे। एक लंबे मुकदमें के बाद अन्ततः 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई गयी, ये खबर ने पूरे देष को स्तब्ध कर दिया, हजारों आंखे बहुत रोई, घरों में चुल्हा नही जला, बच्चे स्कूल नही गए, दूर दराज के गांवों को भी उदासी डस गयी।
अपने जीवन के छोटे से ही अन्तराल में भगत सिंह और उनके साथियों ने देषभक्ति के जज़्बे को ऐसे दर्षाया जो उनकी षहादत के बाद हमेषा के लिए अमर हो गयी, उनकी षहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नयी दिषा के साथ एक नयी उर्जा दी। गुलामी से मुक्ति के बाद आज हम एक नये भारत में जी रहे है, जहां प्रत्यक्ष रूप में कोई गोरा दुष्मन तो सामने नही है, लेकिन छिपे हुए न जाने कितने दुष्मन है? भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे राष्ट्रविरोधी तत्व हमें समय से पीछे धकेल रहा है। देष की आजादी के सिपाहियों के सपने का भारत आज किस रूप में है यह सर्वविदित है। लेकिन क्या हम अपने सुनहरे अतीत और देषभक्तों की षहादत को यूं ही व्यर्थ जाने दे? क्या हम केवल ऐसे तिथियों को केवल एक औपचारिकता मानकर याद करे या उनके आचरण को स्वयं में समाहित कर राष्ट्र आराधन को स्पष्ट करे। भगत सिंह जैसे षहीदों को तस्वीरों और स्मारकों का रूप देकर केवल एक प्रतीकात्मक हीरो बनाने के बदले उनके दर्षन को स्वयं में धारण करे, क्योंकि देष भले ही अंग्रजी राजनीतीक दासता से मुक्त हो गया है, लेकिन सैकड़ो विघटनकारी षक्तियां देष को फिर से गर्त में ले जाने की दिषा में प्रयत्नषील है और ऐसी परिस्थितयों में देष को आज एक नही हजारों भगत सिंह की जरूरत है।